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सोच अचरज होता है|

मैं पापा की नाक नहीं कटाना चाहती और नहीं चाहती की मेरी वजह से मेरे परिवार पर कोई ऊँगली उठाए  |

यह शब्द थे मोलड़बंद एक्सटेंशन की एक कक्षा नौ की छात्रा के | मोलड़बंद एक्सटेंशन साउथ दिल्ली की एक बड़ी बस्ती है जहाँ अलग-अलग राज्य के हज़ारों प्रवासी रहते हैं | कुछ उत्तर प्रदेश से, कुछ उत्तराखंड से तो कुछ बिहार से | दिखने में तो मोलड़बंद एक्सटेंशन बहुत चहल-पहल वाली जगह है | साफ़ सफाई की बात करे तो सड़को पर कूड़ा कचड़ा और बहते नाले का पानी है | मखियों की संख्या मानो वहाँ के लोगों से ज़्यादा हैं और संकीर्ण गलियाँ, जो की छोटे-छोटे, तीतर-बितर घरों की ओर ले जाती है | वहाँ एक छोटा सा मोहल्ला है | जहाँ, कुछ लड़कियाँ अनेकों सपनें अपने पलकों पर सजाए बैठी हैं | दिखने में भोली-भाली, मासूम, कुछ उनमें से शरारती हैं तो कुछ आत्मविश्वास से भरपूर | हमें यह दुनिया जितनी बड़ी लगती है उतनी हीं छोटी इन लड़कियों की दुनिया है | वें, उनका परिवार और उनकी सहेलियाँ, बस इसी के चारों ओर घूमता है इनके जीवन का पहिया |

मैं अपने सहकर्मी के साथ मोलड़बंद एक्सटेंशन की लड़कियों की उच्च शिक्षा पर अन्वेषण करने निकला था |जिसके लिए हमें बस्ती की किशोर छात्राओं से बातचीत कर हमारे विषय से सम्बंधित जानकारी निकालनी थी | गर्मियों का मौसम अंत होने को आ रहा था, पर फिर भी सूरज मानो हमारे सर पर हीं अपनी किरणे बरसा रहा था | दिल्ली की गर्मी के साथ-साथ हमने उसकी उमस का भी अनुभव भरपूर किया | दिन निकल  रहा था और कोई भी ऐसा नहीं मिला जिससे हम कुछ चर्चा कर सकते | बहरहाल, चलते-चलते हम एक मोहल्ले में पहुंचे जहाँ हमें लड़कियों का एक समूह मिला, जिनकी चर्चा मैंने ऊपर की है | मेरी सहकर्मी ने उन्हें हमारा परिचय दिया और उनसे विचार विमर्श करने का आग्रह किया | उनमें से कुछ राज़ी हों गईं और कुछ अपनी-अपनी माँ से पूछ कर हमारे समक्ष वापस आ गईं | हम उनमें से हीं एक के आँगन पर गोलाकार बना कर बैठ गएँ | हमने अपना परिचय और आने का कारण बताते हुए अपनी प्रश्नावली निकाली और उनको भी अपना परिचय देने को कहा | मुस्कुराते हुए बड़ी हीं मासूमियत के साथ उन्होंने अपना-अपना नाम बताया, अपनी आयु और कक्षा की जानकारी दी |

हमारे प्रश्न तो बड़े सरल थे जोकि हमने बड़ी सरलता से उनसे पूछ दिया | किन्तु , जब हमने उनसे उनका उत्तर सुना तब उन उत्तरों की जटिलता में फँस कर रह गए | उनके उत्तर उनकी आयु की तुलना में बहुत ज़्यादा गहरी थी | एक तरफ हम शहर के किशोर, अपने बारे में हीं सोचते रहते हैं, माता-पिता किसी बात के लिए मना कर दे तो सारा घर सर पर उठा लेते हैं तो कभी अश्रुओं की धारा से अपनी हर बात मनवा लेते है | हमारी समस्याएँ जितनी छोटी होती, उतनी हीं बड़ी हमारी प्रतिक्रिया होती है लेकिन इन लड़कियों की समस्या कई गुना बड़ी और कई गुना उलझी है फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं |

हम अगर परीक्षा में कभी असफल हो जाते थे तो हमें दूसरा मौका मिलता था, हमसे असफलता का कारण पूछा जाता था लेकिन ये लड़कियाँ अगर असफल हो जाती तो कोई कारण न पूछकर सीधे घर पर बैठा दी जाती हैं | इनसे कोई नहीं पूछता कहाँ कमी रह गई थी, क्या असुविधाएँ हैं, कहाँ मेहनत बाकी रह गई |

मेरे छोटे भाई के जन्म के बाद तो मुझे एक साल पढाई छोड़नी पड़ गई | अभी पढाई शुरू की है तो समय ही नई मिलता पढ़ने को, भाई का ख्याल रखने में हीं सारा दिन निकल जाता | ये मुझे छोड़ता हीं नहीं | यह उन्ही में से एक ने हस्ते-हस्ते, अपने भाई को गोद में लिए हुए कहा |

मेरी सहेली की तो शादी करा दी गई जब वह कक्षा नौवीं में फ़ैल हो गई और ऐसा तो दो-तीन और लड़कियों के साथ हुआ है | मुझे तो ये डर हमेशा रहता की कहीं मैं फ़ैल कर जाऊँ | क्या किसी के असफल हो जाने पर यह दृढ़ीकरण सही है ? क्या यह दंड नहीं की असफल होने पर आप किसी को एक बंधन में बाँध दो जिससे वह ज़िन्दगी भर जूझता रहे और अपने असफल होने पर खुद को कोस्ता रहे ? लेकिन इसमें माता-पिता का भी क्या दोष ? मेहनत की कमाई अगर बेटी पर लगाए और  वह प्रतिफल न दे तो उनके पास भी कोई उपाय नहीं | अच्छा लड़का देख कर रिश्ता करा दिया, कम से कम बेटी सुखी तो रहेगी | क्या फायदा फिर से पढ़ाने का ? पढ़ने को दूसरे शहर थोड़ी ही भेजना है |

मेरी एक पड़ोसन की शादी स्कूल छुड़वा कर बहुत कम उम्र में हो गई | आज वो २३ साल की है और उसके दो बच्चे हैं | उसे बहुत शर्म आती है | वो हमसे बात नहीं करती | वह क्यों बात करेगी किसीसे? उसे खुद नहीं पता उसके ज़िन्दगी में क्या होगया | कब किताबों की जगह दूध की बोतल ने ले ली और गोद में बच्चा आ गया | क्या दे सकता है उसे कोई इसका जवाब ? हमने जब उनसे प्रश्न किया की वो क्या बनना चाहती हैं तो उनका जवाब और चौकाने वाला था |

मैं ग्रेजुएशन के साथ-साथ पार्ट-टाइम जॉब करना चाहती हूँ ताकि अपने परिवार को आर्थिक रूप से मदद कर सकूँ | पापा बहुत मुश्किल से पढ़ाते हैं, तो मेरा भी फ़र्ज़ बनता है की परिवार का भरण-पोषण में मैं भी मदद करूँ |

मैं डांसर बनना चाहती हूँ लेकिन पापा को पसंद नहीं तो मैं जॉब करुँगी और अपनी छोटी बहन को सिखाऊँगी |

परिवार के प्रति इतना चिंतन, इतनी कम उम्र में ज़िम्मेदारी लेने के लिए तत्पर और परिवार की आर्थिक व्यवस्था सुधारने को ही अपना लक्ष्य बनाना | कितने परिपक्व हैं इनके विचार और एक तरफ हम, अपनी ज़रूरतें पूरा करना, कभी नई गाड़ी खरीदना, एडवेंचर ट्रिप पर जाना, विदेशी कुत्ते पालना | कितनी उलटी हैं हमारी विचार-धारा ? कभी-कभी हम इतने आत्मग्रस्त हो जाते हैं की अपने अलावा कुछ दिखता हीं नहीं |

हमसे पूछा जाए क्या आप अपनी ज़िन्दगी में खुश हैं ? हम हज़ार शिकायतें करेंगे, हर सफल प्रयास करेंगे यह जताने के लिए की हम कितने नाखुश हैं किन्तु यही बात इन लड़कियों से जब हमने पूछा तो इनका उत्तर था – हम बहुत खुश हैं | हमें हमारा परिवार, हमारी सहेलियाँ और हमारा मोहल्ला बहुत पसंद हैं | हाँ, असुविधाएँ हैं लेकिन हम सब कुछ हासिल करके अपने परिवार को गर्व महसूस कराएंगे |

कितने विपरीत हैं न हम इनसे ? कितनी आशावादी हैं ये लड़कियाँ ? कितनी सहनशील हैं ये ? हम तो बस यही सोच अचरज रह गए |

Saurav Verma

Saurav Verma, 21 years, Graduation in Electrical and Electronics Engineering. Worked for children in his setup called Happiness alongside college. Fellow at Mant, Purulia, West Bengal working with the setting up of a community radio station, which will help bring voice and awareness in the community.

8 thoughts on “सोच अचरज होता है|

  1. Love your writing style Saurav, though I’d like to debate on whether it’s always right to remain content with what you have and who’s to say how happy someone else is.
    Keep writing. Will wait for more such pieces! 🙂

    1. Thankyou Swati, please keep suggesting your insights and i would love to have a debate. It will help me think from different perspectives.

  2. Good read Saurav. I like your language usage and narrative. Will like to revisit this post after a month and see if you can identify some single stories here! Looking forward to next blog from you 🙂

    1. Thankyou Anupama. I will surely look for what you said.I hope to give you more beautiful insights of my experiences next.

  3. Very nicely narrated! I hope these girls will get a day in their life when they get to raise their voices, make their choices and stop sacrificing their dream.

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